“अक्षय तृतीया की चौपाल कक्का की वाणी में परशुराम का धर्म, संतुलन और रिश्तों का अमर संदेश” कैलाश पाण्डेय
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“अक्षय तृतीया की चौपाल कक्का की वाणी में परशुराम का धर्म, संतुलन और रिश्तों का अमर संदेश”
कक्का की चौपाल उस दिन कुछ और ही जीवंत लग रही थी। पीपल के विशाल पेड़ की ठंडी छांव में खाट बिछी थी। दूर कहीं बैलों की घंटियों की मधुर झंकार वातावरण में घुल रही थी, और हवा में पके अनाज की सौंधी खुशबू मन को छू रही थी। ढलती शाम के साथ आकाश अपने रंग बदल रहा था—पहले हल्का सुनहरा, फिर गहरा केसरिया… मानो प्रकृति स्वयं कोई उत्सव मना रही हो।
कक्का ने अपनी लाठी के सहारे बैठते हुए गला साफ किया। पास ही घसीटा और चौरंगी लाल ध्यान से उनकी ओर झुक आए।
“अरे घसीटा, चौरंगी… आज की हवा कुछ अलग नहीं लग रही तुम्हें?” कक्का ने धीमे, मगर गूंजते स्वर में कहा।
घसीटा ने चारों ओर नजर दौड़ाई, “सच कह रहे हो कक्का… जैसे सब कुछ शांत भी है और भीतर से जागा हुआ भी।”
कक्का हल्के से मुस्कुराए, “क्योंकि आज अक्षय तृतीया है बेटा… वो दिन, जिसका पुण्य और प्रभाव कभी क्षय नहीं होता अक्षय।”
उसी क्षण पास के पेड़ से कोयल की मधुर “कू… कू…” गूंज उठी, जैसे प्रकृति भी इस सत्य की गवाही दे रही हो।
चौरंगी लाल उत्सुक होकर आगे झुका, “कक्का, त्योहार तो और भी होते हैं… ये इतना खास क्यों?”
कक्का ने आसमान की ओर इशारा किया, “देखो, आज सूर्य मेष में और चंद्र वृषभ में उच्च होते हैं। जब ये दोनों अपने श्रेष्ठ स्थान पर होते हैं, तो पूरी प्रकृति संतुलन में आ जाती है। और जब ऊपर संतुलन हो, तो नीचे जीवन भी अपनी राह खुद पा लेता है।”
हवा का एक हल्का झोंका आया… पीपल के पत्ते सरसराए जैसे कोई अदृश्य संवाद चल रहा हो।
कक्का की आवाज़ अब और गंभीर हो गई,
“और सुनो… इसी दिन भगवान परशुराम का अवतरण हुआ था। वे केवल योद्धा नहीं थे वे संतुलन के रक्षक थे। ब्राह्मण का ज्ञान और क्षत्रिय का पराक्रम… ऐसा अद्भुत संगम, जो आज भी हमें जीने का सही मार्ग दिखाता है।”
घसीटा ने धीरे से पूछा, “कक्का, क्या इसलिए इस दिन नए काम शुरू करते हैं?”
कक्का ने सिर हिलाया, “बिलकुल। इस दिन लिया गया हर संकल्प ‘अक्षय’ बन जाता है। किसान नई फसल की योजना बनाता है, व्यापारी नया बही-खाता खोलता है… और परिवार नए रिश्तों की नींव रखते हैं।”
तभी दूर मंदिर से घंटी की आवाज़ गूंजी—
“टननन… टननन…”
और पूरा वातावरण और भी पवित्र हो उठा।
चौरंगी लाल की आँखें चमक उठीं, “मतलब शादी-ब्याह भी इसी दिन से शुरू होते हैं?”
कक्का की आँखों में गहराई उतर आई, “हाँ बेटा… यही तो सनातन की असली सुंदरता है। इस शुभ मुहूर्त से विवाह शुरू होते हैं जहाँ सिर्फ दो लोग नहीं, दो कुल जुड़ते हैं। एक नया संसार बसता है, जहाँ माँ की ममता, पिता का साया, भाई-बहन की हंसी… सब एक साथ खिलते हैं।”
हवा में जैसे दूर से आती ढोलक की थाप गूंज उठी
“ढम… ढम… ढम…”
मानो कोई बारात रास्ते में हो…
“संयुक्त परिवार…” कक्का ने धीमे स्वर में कहा,
“वो एक कच्चे धागे जैसा होता है। दिखने में नाज़ुक, पर जब उसमें प्रेम, त्याग और संस्कार पिरो दिए जाएं… तो वही सबसे मजबूत बंधन बन जाता है।”
घसीटा की आँखें नम हो गईं, “कक्का… ये तो दिल को छू गई बात।”
कक्का ने स्नेह भरी नजरों से दोनों को देखा,
“और याद रखना… परशुराम जी की तरह जीवन में संतुलन बनाए रखना ही सच्चा धर्म है। जब भी अन्याय बढ़े उसे रोकना, और जब भी रिश्ते टूटने लगें उन्हें जोड़ना… यही अक्षय तृतीया का असली संदेश है।”
सूरज अब क्षितिज के पार जा चुका था। आकाश में तारे टिमटिमाने लगे थे। चौपाल में एक गहरी शांति थी लेकिन वो खाली नहीं, बल्कि विचारों, भावनाओं और एक नई समझ से भरी हुई।
पीपल के पत्ते फिर धीरे-धीरे हिले…
जैसे प्रकृति स्वयं कह रही हो
“जो आज समझा… वही जीवन भर अक्षय रहेगा…”
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