सावधान ! चुनाव आ गया ?
अगर आप सच सुनने के आदी हैं, तो झूठ बोलना छोड़ दो, अगर जबाब नही चाहिए तो सवाल करना छोड़ दो। अगर सपनो को हकीकत में तब्दील करने की ज़हमत न हो तो ख़्वाब देखना छोड़ दो। और अगर ज़िन्दा रहना चाहते हो, तो मरणशील सियायत व व्यवस्था के बेढंगेपन पर आवाज़ उठाना सीख लो। क्योंकि ज़िन्दा हो, तो ज़िन्दा नज़र आना जरूरी है।
वैसे तो मेरा शहर इतना खूबसूरत है। जैसे उसके अंग-प्रत्यंग सजाए गए हों। जैसे गली-गली गढ्ढे, हर मोड़ में स्पीड ब्रेकर, नालियों में बजबजाहट, फ़ाटक में बारात सी भीड़, चौराहे-दर-चौराहे क्रीज़ बनाये कार्यकर्ता, मुफ़्त का पान खाये बिदुराये नेता, कन्धों में टंगा गमछा, माथे में चुनावी हार-जीत का सिकुड़न, और भी बहुत कुछ है जिसे हम राजनीतिक लोगो के सिरे फोड़े तो बेहतर होगा क्योंकि बेढंगापन ऐसा है जैसे हाथ लगाकर बिगाड़े गए हों। पर ऐसा नही है, नेताओं के भाषण और आश्वासन में ही इतना दम है कि बनता हुआ काम भी इस शहर में बिगड़ जाता है। राजनीतिक दृष्टिकोण से अनूपपुर बड़ा विधानसभा क्षेत्र है, क्योंकि यहां भांति-भांति के राजनीतिक विचारक हैं, गली-गली, खोली-दर-खोली नेता हैं। पार्टियों में झंडे, बैनर, पोस्टर कम, बांधने-चिपकाने वालों की संख्या अधिक है। अब आप ही सोचिए जब विधायकीय का दावेदारी करने वाले दर्जन भर नेता हों, तो उसे चुनाव नही कहा जा सकता। बल्कि उसे साधारण तौर से विधानसभा चलाऊ नेता प्रकट करने की क्रिया मात्र कह सकते हैं। व एक बात और है जब अनूपपुर के राजनीतिज्ञकार लोकसभा, विधानसभा चुनाव में घोषणाओं का धाराप्रवाह शुरू करते हैं, तो पूरा शहर, पूरा विधानसभा, पूरा सम्भाग और साथ ही पूरा मध्यप्रदेश उनकी राजनीतिक घोषणाओं से सड़ जाता है, देर तक की सड़न से कई और नेता बिलबिलाते, झटकारते हुए बाहर आते हैं। बाहर आते ही उनमें से भी कुछ बोलते और फुसकारते हैं। जनता सुनती है, खीझती है, सिर खुजाती है हाथ में तम्बाकू के गंध तो फोड़ते हैं पर मुँह से उफ़ तक नही करते क्योंकि देश मे सबसे ज्यादा मर्यादा बचा है तो जनताओं में।
अनूपपुर विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस और भाजपा के बीच घमासान होना है जिसके एक छोर से धन तो दूसरी छोर से तन-मन है। रस्सी तन गया है, खींच-तान शुरू है। विधायक की कुर्सी में बैठने की ललक दोनों छोर से है। अपितु कांग्रेस कमजोर प्रत्याशी को आगे कर अपना मज़बूत पक्ष छुपाए बैठा है, क्योंकि कांग्रेस ने भाजपा को चकमा देने का खेल बिसाहूलाल से ही सीखा है। और शायद यह बात उनके पूर्व के पार्टी में मौजूद कार्यकर्ताओं को मालूम नही है। पर राजनीतिक खेल का अंत, अंततः कांग्रेस ही करेगा। अनूपपुर विधानसभा उपचुनाव में जनता यह बात हज़म भी करे तो कैसे कि कांग्रेस को अगर अपना प्रत्याशी सो करना होगा, तो वह कांग्रेस के पुराने व मेहनतकश कार्यकर्ता को मौका देकर करेगा। उनको क्यों देगा जो अन्दर तक से धरासाई प्रत्याशी है, जो जनता के बीच जाकर यह कहते हों कि पार्टी टिकट देगी तो चुनाव लड़ूंगा। मतलब साफ़ है कि कांग्रेस ने अभी तक अपना प्रत्याशी तय नही किया है। फ़िर राजनीतिक विचारकों में उपचुनाव पर प्रत्याशियों को लेकर फड़फड़ाहट किस बात का है। ये कौन लोग हैं, कैसे गरम कर दिए गए हैं, धुआँ उठा कहाँ से है। भाजपा से तो बिसाहूलाल चुनाव लडेंगे यह तो तय है, पर कांग्रेस से रमेश सिंह को ही टिकट मिलेगा यह कैसे कहा जा सकता है, एक बात। दूसरी बात क्या कांग्रेस को अनूपपुर विधानसभा उपचुनाव में विधायक के प्रत्याशी हेतु अकाल पड़ गया है। जो रमेश सिंह पर पार्टी विधायकीय के रूप में इतना बड़ा जोख़िम उठाएगा। कांग्रेस किसी नए चेहरे को उपचुनाव में उतारेगा पर किसे यह अभी संशय में है। और रही बात बिसाहूलाल की तो बिसाहूलाल के राजनीतिक का यह अंतिम पड़ाव है कार्यकर्ता ज़मीनी हक़ीक़त से वाक़िफ़ हैं, हार की मायूसी चेहरे पर आने लगे हैं, उत्साह-हतोउत्साह में तब्दील हो रहा है। कोई झंडा उठाने को तैयार नही दिख रहा है, पार्टी का अंतर्कलह सड़को में आने लगे हैं, लोग हँसते-हँसते रोने लगे हैं। बकौल नादिम नदीम के कि
सर उठाने की तो हिम्मत नहीं करने वाले
ये जो मुर्दा हैं बग़ावत नहीं करने वाले
मुफ़्लिसी लाख सही हम में वो ख़ुद्दारी है
हाकिम-ए-वक़्त की ख़िदमत नहीं करने वाले
क्रमशः
सावधान ! चुनाव आ गया ? -राजकमल पांडेय
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