भारतीय संस्कृति के महान संरक्षक : स्वामी श्रद्धानंद-१-डॉ. नितिन सहारिया, महाकौशल

भारतीय संस्कृति के महान संरक्षक : स्वामी श्रद्धानंद-१-डॉ. नितिन सहारिया, महाकौशल


सन 1898 की बात है 'आर्य प्रतिनिधि सभा' पंजाब ने धर्म और जातियता ( हिंदु/आर्य धर्म ) की शिक्षा देने के लिए भारतवर्ष के प्राचीन आदर्श ऋषि परंपरा पर एक 'गुरुकुल' खोलने का प्रस्ताव पास किया। सभा में वक्ताओं ने कहा - " अंग्रेजी ढंग की विदेशी शिक्षा के प्रभाव से नवयुवकों में से अपने धर्म और संस्कृति की भावना दिन पर दिन घटती जाती है, वे विदेशी सभ्यता की तरफ आकर्षित होते जाते हैं।  यदि इस पतनोंन्मुख प्रवाह को रोकना है तो वैदिक सिद्धांतों के अनुकूल एक आदर्श शिक्षण संस्था की स्थापना आवश्यक है।" प्रस्ताव तो पास कर दिया गया और ऐसे गुरुकुल के लिए धन और विद्यार्थी प्राप्त करना सहज न था। उस समय तक लोगों ने गुरुकुल का नाम भी न सुना था। जब उनको प्राचीन शास्त्रों में वर्णित ऋषि मुनियों के उन गुरुकुलों का वर्णन सुनाया जाता था, जिनमें विद्यार्थी ब्रह्मचारी बनकर अपने निर्वाह की व्यवस्था स्वयं करके 18 -20 वर्ष तक वेदादि विधाओं का अध्ययन करते थे और उतने समय तक गुरुओं के आश्रम में ही रहते थे, तो लोग आश्चर्य करने लगते थे। वे हंसकर कहते-  श्रीमान जी! इस अंग्रेजी शिक्षा के जमाने में कौन 10 -20 वर्ष तक सिर मुड़ा कर जंगलों में रहेगा और संस्कृत जैसी 'मृत -भाषा' को पढ़ेगा।पर 'आर्य प्रतिनिधि सभा' के अध्यक्ष लाला मुंशीराम जी (1856 से 1926 ,बाद में स्वामी श्रद्धानंद के नाम से विख्यात) जिन्होंने इस प्रस्ताव को पास कराया था ,दूसरी धातु के बने मनुष्य थे। वे इस योजना में आने वाली महान कठिनाइयों और लोगों की उदासीनता की बात को अच्छी तरह समझते थे। इसलिए प्रस्ताव के पास होते ही सभा स्थल पर उन्होंने यह प्रतिज्ञा की कि- *"जब तक मैं गुरुकुल के लिए ₹30000 इकट्ठा न कर लूंगा घर में पैर न रखूंगा।"यह एक ऐसे व्यक्ति की प्रतिज्ञा थी जिसे अपने सिद्धांतों और आत्म शक्ति पर अटल श्रद्धा थी। बस वे अपना काम- धाम छोड़कर भारत के अनेक शहरों का दौरा करने लगी और डेढ़ वर्ष में 30000 की बजाय ₹40000 एकत्रित करके दिखा दिया। इसके बाद गुरुकुल में पढ़ने वाले विद्यार्थियों की समस्या सामने आई ,तो उन्होंने सबसे पहले अपने दोनों पुत्रों इंद्र और हरिश्चंद्र को उसमें दाखिल किया। फिर अपने खास मित्रों के 10- 15 बच्चों को इकट्ठा किया। *हरिद्वार में कनखल के पास हिमालय की तराई में 'कांगड़ी' नाम का गांव दान में प्राप्त करके वहीं 'गुरुकुल' की स्थापना की गई।* आज तो गुरुकुल मामूली सी बात बन गई है और छोटी-छोटी जातियों ने अपने गुरुकुल नामदानी स्वतंत्र संस्थाएं शहरों में ही खोली हैं। पर आज से लगभग 125 वर्ष पूर्व एक जंगली स्थान में जहां अक्सर बाघ, जंगली हाथी घूमा करते थे। छोटे बालकों का उत्तरदायित्व ग्रहण करके कोई शिक्षण संस्था खोलना साधारण साहस का काम ना था। पर *मुंशीराम ( श्रद्धानंद) जी इतने कर्तव्य परायण और सेवाभावी थे कि आरंभ से ही सभी बच्चों की देख-भाल अच्छी तरह अपने बच्चों के समान ही करते थे। उन्होंने जैसे परिश्रम और सलंग्नता से कार्य करके इस संस्था का निर्माण और विकास किया उसकी कल्पना भी हम लोग नहीं कर सकते।

मातृ-भाषा का माध्यम

गुरुकुल की शिक्षा प्रणाली की मुख्य विशेषता यह थी कि वहां वेद ज्ञान के अतिरिक्त और सब विषय विज्ञान, इतिहास, अर्थशास्त्र आदि भी पढ़ाए जाते थे। पर उन सबका माध्यम हिंदी को ही रखा गया। स्वामी श्रद्धानंद ने मातृभाषा द्वारा शिक्षा देने के महत्व को समझा और गुरुकुल में ही उसका क्रियात्मक रूप से परीक्षण उन्होंने किया। गुरुकुल के स्नातकों ने अनेक ऐतिहासिक,दार्शनिक और वैज्ञानिक विषयों पर मौलिक ग्रंथ लिखे। पारिभाषिक शब्दों का निर्माण किया ,बड़े-बड़े विश्वविद्यालय के संस्थापकों के दिमाग में इस बात को दूर कर दिया की हिंदी भाषा के माध्यम से उच्च विज्ञान की शिक्षा नहीं दी जा सकती। तत्कालीन कोलकाता विश्वविद्यालय आयोग के प्रधान मिस्टर सैडलर ने स्वीकार किया  - *"मातृ-भाषा द्वारा शिक्षा देने के प्रशिक्षण में गुरुकुल को अभूतपूर्व  सफलता मिली।"

विदेशी सरकार की आशंका

पर जहां एक ओर श्रद्धानंद जी के इस भारतीयता- जातीयता के रक्षक प्रयोग को सभी देश प्रेमी आशा भरी निगाहों से देख रहे थे ,भारत की विदेशी अंग्रेजी सरकार के पेट में भय के कारण चूहे कूदने लगे। *गुरुकुल की स्थापना के कुछ वर्ष बाद ही अंग्रेजी सरकार की गुप्त रिपोर्ट में लिखा गया था -* "आर्य समाज के संगठन में अभी जो महत्वपूर्ण विकास हुआ है, वह वास्तव में सरकार के लिए बड़े संकट का स्रोत है। यह विकास है - गुरुकुल की शिक्षा प्रणाली। सरकार के लिए सबसे अधिक विचारणीय प्रश्न यह है कि इस समय आर्य समाज के गुरुकुल में शिक्षा प्राप्त करने वाले उपदेशकों का, शिक्षा समाप्त करने के बाद सरकार के प्रति क्या रुख होगा ? इस समय के उपदेशको की अपेक्षा वे किसी और ही ढांचे में ढले हुए होंगे । जिस धर्म का वे प्रचार करेंगे, उसका आधार व्यक्तिगत 'विश्वास' और 'श्रद्धा' होगी ,जिसका जनता पर सहज में बहुत प्रभाव पड़ेगा। उनके प्रचार में संदेह, समझौता और भय की गंध भी न होगी और सर्वसाधारण के हृदय में उसका सीधा असर पड़ेगा।" 

गुरुकुल के एक अधिकारी का कथन है कि - "गुरुकुल की शिक्षा सर्वांश में राष्ट्रीय है। यहां इतिहास इस प्रकार पढ़ाया जाता है, जिससे ब्रह्मचारियों में देशभक्ति की भावना उद्दीप्त हो । इसमें कुछ भी संदेह नहीं की गुरुकुल में यत्न पूर्वक ऐसे राजनीतिक संन्यासियों का दल तैयार किया जा रहा है, जिनका मिशन सरकार के अस्तित्व के लिए भयानक संकट पैदा कर देगा।"

समाज सुधार के क्षेत्र में

गुरुकुल ने भारतीय समाज सुधार के क्षेत्र में भी अप्रत्यक्ष रीति से जो महत्वपूर्ण कार्य किया था। उस पर प्रकाश डालते हुए सन 1914 ईस्वी में ही लंदन के 'न्यू स्टेट्समैन' पत्र ने लिखा था -

" हरिद्वार का गुरुकुल संभवत: संसार के शिक्षा क्षेत्र में सबसे अधिक मनोरंजक परीक्षण है। गंगा के मनोहर दृश्य के बीच, हिमालय की हिमाच्छादित चोटियों के नीचे, सांसारिक वातावरण से बहुत दूर एक आश्रम बना हुआ है। केवल जीवन निर्वाह पर आचार्य,उपाध्याय और सब अध्यापक काम करते हुए गरीबी का जीवन बिताते हैं। यधपि  उनमें से बहुत से बाल बच्चों वाले गृहस्थी हैं, 7 वर्ष की आयु में यहां प्रवेश होता है और 25 वर्ष की आयु तक रखा जाता है। वे बीच में एक बार भी घर नहीं जा सकते ,न कभी किसी स्त्री के साथ रह सकते हैं। वे दिन- रात अपने अध्यापकों के निरीक्षण और संगति में रहते हैं। 25 वर्ष की आयु में समझा जाता है कि वे देश के पूरे सेवक बन गए। भारतीय दृष्टिकोण से उस संस्था की सबसे बड़ी विशेषता जाति-पाति के भेदभाव को मिटाना है। वहां 300 बालकों में ब्राह्मण से लेकर अछूतों तक सभी जातियों के बालक हैं। सबका एकसा जीवन और एक सा रहन-सहन है। पश्चिम की शिक्षा और आदर्शों के सहारे भी उसकी जड़ों को खोदना कठिन है परंतु वहां गुरुकुल में उसकी जड़ें बहुत बड़ी सफलता के साथ काट दी गई है। यह कार्य पूर्व के प्राचीन और सुंदर आदर्श को पुनर्जीवित करने की दृष्टि से ही किया जा रहा है।"

पंजाब में हिंदू संस्कृति और हिंदी की रक्षा

पंजाब की काया पलट करके उसमें जातीयता और धार्मिकता की भावना को जागृत करने का श्रेय बहुत कुछ श्रद्धानंद जी को ही है। क्योंकि पिछले ढाई हजार वर्षों में यूनानियों से लेकर पठानों ,मुगलों तक के हमले का पहली बार पंजाब को ही झेलना पड़ा था। भारत के भाग्य का निर्णय करने वाले पानीपत के तीनों युद्ध उसी की भूमि पर लड़े गए और पठान तथा मुगल शासन का दौरा-दौरा वहीं पर पड़ा। इन सब प्रहारों ने पंजाबियों को सुदृण  और संघर्षील तो बना ही दिया,पर विद्यर्मियों के साथ रहने से भारतीय सभ्यता और संस्कृति को वे बहुत कुछ भूल भी गए। अंग्रेजों ने इस तत्व को पहचाना और पंजाबियों को अपने साथ लेकर मिलाकर रखा। खासकर 1857 की  क्रान्ति में पंजाब की सेना ने इस प्रकार अंग्रेजों की सहायता की और उनके डगमगाती हुई राज्य को बचाया था। इसलिए वे लोग बड़े प्रसन्न थे, वहां अंग्रेजीयत ,ईर्साइयत और फैशन परस्ती आदि को बढ़ावा देते रहे । जिससे वहां के युवक सांसारिक भोग विलास की तरफ आकर्षित बनी रहे और इसकी पूर्ति के लिए अंग्रेजों की नौकरी करके उनके राज्य को मजबूत बनाते रहे। पंजाब में भारतीयता के अभाव का एक बड़ा कारण वहां की जन भाषा उर्दू हो गई थी, और वे लोग हिंदी से प्राय: अपरिचित थे। जैसा हम जानते हैं की भाषा और संस्कृति का बड़ा संबंध है । भाषा के माध्यम से ही हमारे विचार तथा भावनाएं दृढ़ बनती हैं ; जो लोग -उर्दू फारसी पढ़ कर उन भाषाओं के साहित्य में वर्णित भावों तथा कथाओं आदि की चर्चा करते रहते हैं। उनके विचारों और भावों में कितना अंतर होता है। इसकी झलक महाकवि की इन दो चार पंक्तियां में मिलती है- 

" भीम अर्जुन की जगह पर गैव रुस्तम को बिठा ।
 सभ्य लोगों में नहीं दृग आप सकते हैं उठा।कर्ण की ऊंची जगह जो हाथ हातिम के चढ़ी।तो समझ लो ढ़ह पड़ेगी आपकी गौरव गढी । क्या हसन की मसनवी पर आप होकर मुग्ध मन।फेंक देंगे हाथ से वह दिव्य रामायण रतन।।अतः स्वामी श्रद्धानंद  ने अपना निवास स्थान जालंधर में ही बनाकर प्रचार कार्य प्रारंभ किया । इसके लिए उच्च पदस्थ और प्रसिद्ध व्यक्ति होते हुए भी उन्होंने कैसे-कैसे अति सामान्य तरीके अपनाए। इसका वर्णन आफ्रिका निवासी भक्तराम शर्मा ने अपने अनुभवों में लिखा है - "महात्मा मुंशीराम ( श्रद्धानंद ) वर्षों तक इकतारा बजाकर प्रातःकाल जालंधर की गलियों में भजनों व दोहों द्वारा प्रचार करते रहे। लोग उन्हें भिकारी समझकर कुछ देवियां अन्न- वस्त्र दे देती तो वह उसे लाकर आर्य समाज में जमा कर देते थे। यह याद रखना चाहिए कि जालंधर में ही उनकी ससुराल थी, पर उन्होंने कभी झूठी लज्जा अनुभव नहीं की।  है किसी को प्रचार की ऐसी लगन ? "समाज सेवा के क्षेत्र में पदार्पण करने वालों के लिए स्वामी श्रद्धानंद जी का आदर्श नि:सन्देह बड़ा प्रेरणात्मक है।

देश के स्वाधीनता आंदोलन में

 उस समय पंजाब में सर सैयद अहमद खा मुसलमानो के नाम पर कांग्रेस का विरोध कर रहे थे। इसलिए जालंधर के मुसलमान ने अपने यहां कांग्रेस कमेटी को रोकने की कोशिश की और कई प्रकार से उसका विरोध किया। पर धुन के पक्के श्रद्धानंद जी ऐसे विघ्नों की कब परवाह करते थे। उन्होंने वहां कांग्रेस कमेटी का काम धूमधाम से चला कर दिखा ही दिया।
उस समय कांग्रेस का कार्य उन्हीं के साथी आर्य समाज के नेता लाला लाजपत राय जी के हिस्से में चला गया और जानकार लोगों की सम्मति है कि- " लाला लाजपत राय की अंग्रेजों को हटाने का उद्देश्य सामने रखा और श्रद्धानंद जी ने अंग्रेजियत को मिटाने के उद्देश्य को अपनाया।"

स्वामी जी के शेर दिली, अग्रणी कुशल नेतृत्व, राष्ट्रभक्ति और उदार हृदयता से अंग्रेजों का सामना करने के कारण दिल्ली में प्रसिद्धि इतनी बढ़ गई की स्वामी जी को दिल्ली की प्रसिद्ध जामा मस्जिद में भाषण करने को बुलाया गया । वह अद्भुत दृश्य था जब एक आर्य संन्यासी ने गेरुआ वस्त्र धारण किए हुए जामा मस्जिद के मुंबर( इमाम के स्थान पर) खड़े होकर " त्वं हि न: पिता वसो त्वं माता "वाला ऋग्वेद का मंत्र बोलकर मुसलमानो को समझाया - " धर्म प्रेम और उदारता की शिक्षा देता है ,छोटी-छोटी बातों पर हठ  करना नासमझी है।"इस प्रकार सब दूर दिल्ली में, खासकर मुसलमान के सर्वप्रधान धार्मिक स्थान में स्वामी श्रद्धानंद जी का भाषण जनता की स्मृति में अमिट बन गया ।
हिंदू संगठन और श्रद्धानंद जी

 इसमें संदेह नहीं की स्वामी श्रद्धानंद जी ने अपने दूरदर्शी विचारों और प्रयत्नो से कुछ ही समय में हिंदू जाति में एक ऐसी चैतन्यता उत्पन्न कर दी कि उसकी बहुत सी निर्बलता दूर हो गई और वह अनेक क्षेत्रों में प्रगति करके समग्र राष्ट्र का हित साधन करने में समर्थ हुई।

क्रमशः ....
भारतीय संस्कृति के महान संरक्षक : स्वामी श्रद्धानंद-१-डॉ. नितिन सहारिया, महाकौशल भारतीय संस्कृति के महान संरक्षक : स्वामी श्रद्धानंद-१-डॉ. नितिन सहारिया, महाकौशल Reviewed by dainik madhur india on 10:20 AM Rating: 5

No comments:

राष्ट्रीय दैनिक मधुर इंडिया 8 राज्यों में बढते कदम दैनिक अखबार मासिक पत्रिका यूट्यूब चैनल वेबपोर्टल

राष्ट्रीय दैनिक मधुर इंडिया 8 राज्यों में बढते कदम दैनिक अखबार मासिक पत्रिका यूट्यूब चैनल वेबपोर्टल
भारत देश में कही भी पत्रकारिता करने हेतु संपर्क करे संपादक प्रदीप मिश्रा-8770089979
Powered by Blogger.